किनारे
मुंबई के समंदर और उनके किनारों की बात थोड़ी अलग है। ये किनारे भेद-भाव नहीं करते।
यहां लहरें उतनी ही गर्मजोशी से गूची के जूतों पर अपना सर पटकती हैं, जितनी की लखानी के चप्पलों पर।
यहां दस रुपये की अदरक वाली चाय की चुस्की रीबॉक की टी-शर्ट वाले भी लेते हैं और रीबूक वाले भी।
यहां की हवा सुकून देती है। आपके गालों और बालों को सहलाने से पहले वो आपका धर्म, जाती या लिंग नहीं पूछती।
देखो तो यहां अलग-अलग पहनावे में कई बच्चे भी दिखाई देते हैं। पर ये अंतर भी सिर्फ आंखों तक है। आंखे बंद कर लो तो यहाँ रेत पर भागते सभी बच्चों की खिलखिलाहट एक सी ही सुनाई देती है।
मुम्बई के किनारे बहुत अच्छे हैं। वो भेद-भाव नहीं करते।
